जो आज है, कल नहीं होगा
उसकी चिंता करना जरुरी है
सोच-समझ कर खर्च करना होगा,
भविष्य के लिए 'पानी' को बचाना जरुरी है |
कुदरत से हम हैं,कुदरत हम से नहीं
जिन्दा रहने के लिए,इसे बचाना जरुरी है
बरसातीं पानी को इक्कठा करना होगा,
मुफ्त में मिली 'भविष्यनिधि' को बचाना जरुरी है |
जोर से चलने वाले,फव्वारों को छोड़ना होगा
बाल्टी-डिब्बो का ही उपयोग करना होगा
गीले कपडे से कारें पोंछी जाएँ तो बेहतर,
हर बहते पानी को रोकना जरुरी है |
खेती-बाड़ी,ओर बाग़-बगीचों में
नये आयामों की खोज जरुरी है
पानी के खर्च को सीमाओं में बांधना होगा,
समंदर के खारे पानी को,मीठा बनाना जरुरी है |
सोचो नहीं,अमल करना शुरू करदें
बूंद-बूंद पानी बचाकर,घड़ा भरलें
"पवन पागल"सिमित पानी को अमृत मानना होगा,
असीमित जीवन जीने के लिए,जल को बचाना जरुरी है |
Mere Dil Se.....
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
८७.नसीयत कोंन करे ?
जो खुद तो सदा रहे बेकाबू
वो हमें काबू में रहने की नसीयत देतें हैं
जिन्हें जिंदगी में तैरना न आया कभी,
वो हमें समंदर में ग़ोता-खोरी की सलाह देतें हैं |
थोड़ी अपने आस-पास, बिखेर लो खुशबुएँ
अपनी बगियाँ में सुगन्धित फूल क्यों नहीं उगालेते
खुद ने तो गंगा स्नान न किया कभी,
हमें गंगा-सागर में नहाने की सलाह देते हैं |
जिन्होंने कभी किसी का भला नहीं किया
वो हमें भी बुरा ही करने की सलाह देतें हैं
जिन्हें जिंदगी ठीक से जीने का तरीका न आया कभी,
वो हमें जिंदगी जीने का फलसफ़ा बार- बार दोहरातें हैं |
जो आज तक उन्होंने किसी से निभाई हो तो पूंछें सवाल
तमाम जिंदगी लोगों के सवालों में घिरे रहतें हैं
"पवन पागल" जिन्हें आग भुजाना न आया कभी,
वो सुलगती आग को जान-भूज कर,बार-बार हवा देतें हैं
वो हमें काबू में रहने की नसीयत देतें हैं
जिन्हें जिंदगी में तैरना न आया कभी,
वो हमें समंदर में ग़ोता-खोरी की सलाह देतें हैं |
थोड़ी अपने आस-पास, बिखेर लो खुशबुएँ
अपनी बगियाँ में सुगन्धित फूल क्यों नहीं उगालेते
खुद ने तो गंगा स्नान न किया कभी,
हमें गंगा-सागर में नहाने की सलाह देते हैं |
जिन्होंने कभी किसी का भला नहीं किया
वो हमें भी बुरा ही करने की सलाह देतें हैं
जिन्हें जिंदगी ठीक से जीने का तरीका न आया कभी,
वो हमें जिंदगी जीने का फलसफ़ा बार- बार दोहरातें हैं |
जो आज तक उन्होंने किसी से निभाई हो तो पूंछें सवाल
तमाम जिंदगी लोगों के सवालों में घिरे रहतें हैं
"पवन पागल" जिन्हें आग भुजाना न आया कभी,
वो सुलगती आग को जान-भूज कर,बार-बार हवा देतें हैं
बुधवार, 1 दिसंबर 2010
८६.सुधार
लिखने सुनने से कोई बात नहीं बनेगी
जो इरादे मज़बूत हों,समंदर रास्ता दे देगा,
तैर-तैर कर डूबने से,अच्छीतैराकी नहीं कहलाएगी
बिना अक्कल के,क्या समंदर में ईमारत बन पायेगी ?
अच्छा बुरा बनने में,पहले आपकी मर्जी शामिल होती है
दूसरे आपको जब बहलाएँगे ,क्या आप बहल जाओगे ?
गलतियाँ आप को पकड़ें ,या आप गलतियों को पकड़ें '
बैगर गलतियों के, क्या अपने आप को सुधार पाओगे ?|
कहतें हैं इन्सान,गलतियों का पुलन्दा है
सीधे-सीधे क्यों नही कहते की,हम उसके हाथ से बंधी कटपुतलियाँ हैं,
हर किसी का अंत है,हम मेंसे कोई अंनंत नहीं,
जो गलतियाँ जवानी में नहीं ,तो क्या खाक बुढ़ापें में सुधार पाओगे ?|
तुम्हे जीना है,ओर लोगों कोजीने देना है
फिर क्यों नहीं अपनी हरकतों से ,बाज़ आते हो
"पवन पागल" मंजिल डूबने से नहीं,तैरने से मिलती है,
जो अपने आप को बचा पाये,तभी तो दूसरों को बचाओगे |
जो इरादे मज़बूत हों,समंदर रास्ता दे देगा,
तैर-तैर कर डूबने से,अच्छीतैराकी नहीं कहलाएगी
बिना अक्कल के,क्या समंदर में ईमारत बन पायेगी ?
अच्छा बुरा बनने में,पहले आपकी मर्जी शामिल होती है
दूसरे आपको जब बहलाएँगे ,क्या आप बहल जाओगे ?
गलतियाँ आप को पकड़ें ,या आप गलतियों को पकड़ें '
बैगर गलतियों के, क्या अपने आप को सुधार पाओगे ?|
कहतें हैं इन्सान,गलतियों का पुलन्दा है
सीधे-सीधे क्यों नही कहते की,हम उसके हाथ से बंधी कटपुतलियाँ हैं,
हर किसी का अंत है,हम मेंसे कोई अंनंत नहीं,
जो गलतियाँ जवानी में नहीं ,तो क्या खाक बुढ़ापें में सुधार पाओगे ?|
तुम्हे जीना है,ओर लोगों कोजीने देना है
फिर क्यों नहीं अपनी हरकतों से ,बाज़ आते हो
"पवन पागल" मंजिल डूबने से नहीं,तैरने से मिलती है,
जो अपने आप को बचा पाये,तभी तो दूसरों को बचाओगे |
८५.नेक इरादे
बैठो उनके पास,जो महकते हों
वो ही फूल बोयें जांये,जो सुघंदित हों
जो न रह पायें,किसी उसूल पे कायम
उनसे दोस्ती न हो,तो दुश्मनी भी न हो |
विषेले साँपों के बीच,रहना तो पड़ता है
क्या चन्दन पर साँपों के जहर का असर होता है ?
चन्दन बन,घिस-घिस कर काम आते रहो,
जहर तो रहेगा ,पर अपनी महक को बढ़ाते रहो |
जो अपने मतलब के लिए,चहकते हों
उस कलरव से हमारा ,कोई नाता न हो
उनसे दोस्ती करो,जो सब के दोस्त हों,
फिर लोगों की क्या परवाह,बस हमारे इरादे नेक हों |
जो देखें हिमालय को,अगले कदम हिमालय पर हों
वो ही कुआ खोंदें,जिसमें सब के लिये पानी हो
"पवन पागल" आग सीनें में हो,पर लोगों को खबर न हो,
कल की फ़िक्र क्यों हो,न जाने कल हो न हो |
वो ही फूल बोयें जांये,जो सुघंदित हों
जो न रह पायें,किसी उसूल पे कायम
उनसे दोस्ती न हो,तो दुश्मनी भी न हो |
विषेले साँपों के बीच,रहना तो पड़ता है
क्या चन्दन पर साँपों के जहर का असर होता है ?
चन्दन बन,घिस-घिस कर काम आते रहो,
जहर तो रहेगा ,पर अपनी महक को बढ़ाते रहो |
जो अपने मतलब के लिए,चहकते हों
उस कलरव से हमारा ,कोई नाता न हो
उनसे दोस्ती करो,जो सब के दोस्त हों,
फिर लोगों की क्या परवाह,बस हमारे इरादे नेक हों |
जो देखें हिमालय को,अगले कदम हिमालय पर हों
वो ही कुआ खोंदें,जिसमें सब के लिये पानी हो
"पवन पागल" आग सीनें में हो,पर लोगों को खबर न हो,
कल की फ़िक्र क्यों हो,न जाने कल हो न हो |
८४.खोया-पाया
गैरों ने कम,अपनों ने ज्यादा रुलाया
जो उजालों ने दी दस्तक,अपने को अँधेरे में ही पाया,
ख़ुशी कम,गम बेहिसाब पाया
हर तीर को अपनी ही,ओर आता पाया |
जो जीना ही रास न आया ,तो मरने की तम्मना कोन करे ?
जिसे डूबने का डर न हो,वो तूफ़ान की फ़िक्र क्यों करे ?
एक तेरा जो साथ मिला,जिंदगी में सब कुछ मिल गया
सुकून मिला इतना की ,सिर्फ तेरे आगे रोने को दिल करे |
तेरे रहते सब कुछ पाया,क्या काया- क्या माया ?
वो मर कर फिर जी गया,जिसने मन से तुझे पाया,
जो सुख में खोगया ओर गम से डर गया,वो जीते-जी मर गया
"पवन पागल" पहले ज्ञान न पाया ,जो तुझे इतनी देर से अपनाया |
जो उजालों ने दी दस्तक,अपने को अँधेरे में ही पाया,
ख़ुशी कम,गम बेहिसाब पाया
हर तीर को अपनी ही,ओर आता पाया |
जो जीना ही रास न आया ,तो मरने की तम्मना कोन करे ?
जिसे डूबने का डर न हो,वो तूफ़ान की फ़िक्र क्यों करे ?
एक तेरा जो साथ मिला,जिंदगी में सब कुछ मिल गया
सुकून मिला इतना की ,सिर्फ तेरे आगे रोने को दिल करे |
तेरे रहते सब कुछ पाया,क्या काया- क्या माया ?
वो मर कर फिर जी गया,जिसने मन से तुझे पाया,
जो सुख में खोगया ओर गम से डर गया,वो जीते-जी मर गया
"पवन पागल" पहले ज्ञान न पाया ,जो तुझे इतनी देर से अपनाया |
८३.कवि और कविता
जब से पुराने कवि गये,कविता कंही खो गयी
वो कुछ ऐसा लिख गये की,हमेशा के लिए दिमाग में छागयी ,
वो अपने शौक में,अपनी धुन में,अनवरत लिखते रहे
उनको छपने का शौक न था,पर आज छपाई कविता को खागयी |
उनकी सोच लम्बी थी,इसलिये कविता विस्त्तार पागयी
बदलाव ओर वक़्त की मार से,कुछ ज्यादा ही भिखर गयी ,
पैसे से ज्यादा अपने मान-सम्मान को अहमियत देते रहे
सिमित सम्मान व असीमित माया,कविता को मार गयी |
अपने स्वार्थ के लिये ,साहित्य का गला घोटते रहे
उन्होंने साहित्य के लिये गले कटवा लिये ,
"पवन पागल" अति से- मति,ज्यादा ही नाराज़ होगयी
दिलों को छूने वाली,आज अँधेरे में कहीं खोगयी |
वो कुछ ऐसा लिख गये की,हमेशा के लिए दिमाग में छागयी ,
वो अपने शौक में,अपनी धुन में,अनवरत लिखते रहे
उनको छपने का शौक न था,पर आज छपाई कविता को खागयी |
उनकी सोच लम्बी थी,इसलिये कविता विस्त्तार पागयी
बदलाव ओर वक़्त की मार से,कुछ ज्यादा ही भिखर गयी ,
पैसे से ज्यादा अपने मान-सम्मान को अहमियत देते रहे
सिमित सम्मान व असीमित माया,कविता को मार गयी |
अपने स्वार्थ के लिये ,साहित्य का गला घोटते रहे
उन्होंने साहित्य के लिये गले कटवा लिये ,
"पवन पागल" अति से- मति,ज्यादा ही नाराज़ होगयी
दिलों को छूने वाली,आज अँधेरे में कहीं खोगयी |
८२.जो तुम न होते
जो''औरत'न होती,तो न हम होते न तुम होते
न ताजमहल होता,न शहनाईयां होंती न नक्कारे होते,
होते सिर्फ,दिलजलों के सपनाई महल होते
जिनमें रोशनी नहीं,घुप्प अँधेरे होते |
न बीबियों के शानदार मकबरे होते
न दरबारों में लाजवाब नाच- गाने होते,
मकबरों की जगह सिर्फ चबूतरे होते
और दरबारों में सिर्फ बेनामी शायर होते |
न शायरी होती,न नामी शायर होते
न फूलों में पुंकेसर होते,न भोंरे उनका रस चूँसते ,
होतीं सिर्फ तुक-बंदियां,जिन्हें जबरन सुनते
फूलों की बजाय कांटें होते,जो हर जगह चुभते रहते |
न बरातें होंतीं ,न चुल -बुले बाराती होतें
न दहेज की पीड़ा होती,न दहेज के खरीदार होते,
न बेजा जुल्म होते,न जुल्मों के ठेकेदार होते,
होंतीं सिर्फ नाम की रातें ,जिसमें अधिकतर खैराती होते |
जो न होता हुस्न , तो बुर्के नदारत होते,
अगर कत्ले-आम मचता तो,पहरेदार निहथे होते
"पवन पागल" जो 'वो'न होंतीं,तो रौशनी की जगह अँधेरे होतें,
न कोई हमारा होता,न हम किसी के होंते |
न ताजमहल होता,न शहनाईयां होंती न नक्कारे होते,
होते सिर्फ,दिलजलों के सपनाई महल होते
जिनमें रोशनी नहीं,घुप्प अँधेरे होते |
न बीबियों के शानदार मकबरे होते
न दरबारों में लाजवाब नाच- गाने होते,
मकबरों की जगह सिर्फ चबूतरे होते
और दरबारों में सिर्फ बेनामी शायर होते |
न शायरी होती,न नामी शायर होते
न फूलों में पुंकेसर होते,न भोंरे उनका रस चूँसते ,
होतीं सिर्फ तुक-बंदियां,जिन्हें जबरन सुनते
फूलों की बजाय कांटें होते,जो हर जगह चुभते रहते |
न बरातें होंतीं ,न चुल -बुले बाराती होतें
न दहेज की पीड़ा होती,न दहेज के खरीदार होते,
न बेजा जुल्म होते,न जुल्मों के ठेकेदार होते,
होंतीं सिर्फ नाम की रातें ,जिसमें अधिकतर खैराती होते |
जो न होता हुस्न , तो बुर्के नदारत होते,
अगर कत्ले-आम मचता तो,पहरेदार निहथे होते
"पवन पागल" जो 'वो'न होंतीं,तो रौशनी की जगह अँधेरे होतें,
न कोई हमारा होता,न हम किसी के होंते |
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