में तुम पर फ़िदा न होऊं ,तो फ़िदा होऊं किस पे ?
तुमने फिजां में इतने जो ,रंग बखेर दियें हैं,
में इनको बिखेरूं तो, बिखेरूं किस पे?
अदा इतरा जाये ,तो हो सितम किस पे ?
तुम्हारी अंगड़ाईयों ने,कितनों की कन्नियाँ काट दीं हैं ?
में उनको समेटूं तो, समेटूं किस पे ?
माँझा उलझ जाये , तो दोष किस पे ?
तुमने इतने जो पेच लड़ा दियें हैं,
में खींच कर न काटूं ,तो सितम किस पे ?
तुम पर नाराज़ न होंउ , तो होऊं किस पे ?
हर एक कटी पतंग पर, तुम्हारा नाम है,
आखिर में यकीं करूँ ,तो करूँ किस पे?
में तुम पर इल्ज़ाम न धरूँ, तो धरूं किस पे ?
तुम ने इतने बखेड़े खड़े कर दिये हैं
धुली चादर को बिछाऊ , तो बिछाऊ किस पे ?
में अगर ज़मीं पर न चलूँ,तो चलूँ किस पे?
तुमने हवाओं में इतनी रफ़्तार भर दी है
में इनको थामूं,चढ़ कर किस पे ?
"पवन पागल" रोऊँ , तो रोंउं किस पे ?
इन आँखों की ख़ामोशी,फिर भी नहीं जाती है,
में इन्हें बंद तो करलूं, पर खोलूं तो खोलूं किस पे ?
Mere Dil Se.....
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
(३१) सूखे घरोंदे
दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की ?
लोगों ने नजदीक ही रास्ते बना लिए|
में सूखी आँखों से ज़िन्दगी भर देखता रहा,
बस्ती वालों ने आलीशान मकान बना लिए|
क्या चर्चा करूँ ,मेरे अपनों के रिश्ते की ?
सच्चाई को नहीं परखा,दिलों में नासूर बनालिए|
में उनका जिंदगी भर, इंतजार करता रहा,
रिश्ते दारों ने रिश्ते , बेमानी बना लिए|
किसे तमन्ना है,जी भर के जीने की,
लोगों ने ज़रा सी बात के तमाशे बना लिए|
में अब भी आती-जाती बहार देख रहा हूँ,
चाहने वालों ने घरों में सूखे घरोंदे बना लिए|
ज़रूरत क्या है ,दूसरों के घरों में झाँकने की ?
पहेले खुद ,अपना घर तो सजा लीजिये ,
में बरसों से यह सब कुछ देखता रहा,
चंद लोगों ने मेरे ही घर में, झरोखे बना लिए|
बुरे वक़्त में ज़रूरत है, नजरिया बदल ने की,
जिन्होंने बदल लिए,वो सभी के होलिये,
"पवन पागल" नम आँखों से,उन्हें देखता रहा,
पर ये क्या उनहोंने,आँखों के नये चश्में बना लिए ?
लोगों ने नजदीक ही रास्ते बना लिए|
में सूखी आँखों से ज़िन्दगी भर देखता रहा,
बस्ती वालों ने आलीशान मकान बना लिए|
क्या चर्चा करूँ ,मेरे अपनों के रिश्ते की ?
सच्चाई को नहीं परखा,दिलों में नासूर बनालिए|
में उनका जिंदगी भर, इंतजार करता रहा,
रिश्ते दारों ने रिश्ते , बेमानी बना लिए|
किसे तमन्ना है,जी भर के जीने की,
लोगों ने ज़रा सी बात के तमाशे बना लिए|
में अब भी आती-जाती बहार देख रहा हूँ,
चाहने वालों ने घरों में सूखे घरोंदे बना लिए|
ज़रूरत क्या है ,दूसरों के घरों में झाँकने की ?
पहेले खुद ,अपना घर तो सजा लीजिये ,
में बरसों से यह सब कुछ देखता रहा,
चंद लोगों ने मेरे ही घर में, झरोखे बना लिए|
बुरे वक़्त में ज़रूरत है, नजरिया बदल ने की,
जिन्होंने बदल लिए,वो सभी के होलिये,
"पवन पागल" नम आँखों से,उन्हें देखता रहा,
पर ये क्या उनहोंने,आँखों के नये चश्में बना लिए ?
(३०) कर्म-कुशलता
कैसे भी हों,कर्म तो सभी करतें हैं,
ओर करना भी चाहिए,
बिना फल की कामना से करें,तो क्या कहना,
ओर 'कर्म में
'कर्म कुशलता ' का समावेश हो जाये तो'
वाह! क्या कहना ?
यक़ीनन आपके सभी कर्म,
शतप्रतिशत सफल होंगे |
ओर करना भी चाहिए,
बिना फल की कामना से करें,तो क्या कहना,
ओर 'कर्म में
'कर्म कुशलता ' का समावेश हो जाये तो'
वाह! क्या कहना ?
यक़ीनन आपके सभी कर्म,
शतप्रतिशत सफल होंगे |
(२९) नाकाम कर्म
हम लोग सपनों में ही,खयाली पुलाव बनाते हैं,
ओर सपनों को ,हकीकत में बदलने के लिए ,
हम लोग खूब बढ़-चढ़ कर बोलतें हैं,
इसीलिए हम असली कर्म करने में नाकाम रहतें हैं|
ओर सपनों को ,हकीकत में बदलने के लिए ,
हम लोग खूब बढ़-चढ़ कर बोलतें हैं,
इसीलिए हम असली कर्म करने में नाकाम रहतें हैं|
(२८) जातिंयाँ
कोई जात-पांत नहीं होती,
होती है तो सिर्फ हमारे मन की सोच|
'ब्राह्मणत्व ' तत्व वाले,
'शुद्रत्व' तत्व वालों की अच्छाई लेंलें ,
ओर
शुद्रतत्व वाले
ब्राह्मणत्व तत्व वालों की अच्छाई लेंलें ,
ओर
दोनों तत्व ऊँचे उठें ,ओर नीचे न गिरें,
तो फिर क्या जाती क्या पांती |
एक ही मां, ओर उसकी एक ही छाती,
फिर चाहे ब्राह्मण हो,
या शुद्र,
"पवन पागल' 'भारतमाता ' की एक ही जाती |
होती है तो सिर्फ हमारे मन की सोच|
'ब्राह्मणत्व ' तत्व वाले,
'शुद्रत्व' तत्व वालों की अच्छाई लेंलें ,
ओर
शुद्रतत्व वाले
ब्राह्मणत्व तत्व वालों की अच्छाई लेंलें ,
ओर
दोनों तत्व ऊँचे उठें ,ओर नीचे न गिरें,
तो फिर क्या जाती क्या पांती |
एक ही मां, ओर उसकी एक ही छाती,
फिर चाहे ब्राह्मण हो,
या शुद्र,
"पवन पागल' 'भारतमाता ' की एक ही जाती |
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