सच बोलते-बोलते,सुर्ख लाल होट काले पड़ गये
फिर सच का यकीन,दिलाने के लाले पड़ गये |
चापलूसी सच से,लोग बहुत खुश रहते हैं
असल सच सुन सभी,आग-बबूला हो जातें हैं |
जो देखा दूर से उन्हें,ठीक-ठाक नज़र आये
जो देखा पास से, टूटे-फूटे नज़र आये |
पास से देखने के लिए,जिंदगी के दिन ही कम पड़ गये
जितनों को भी देखा,वो सब किनारा कर गये |
जो देखा गहराई में,सच के नमूने मिल गये
कुछ परेहट गये,कुछ शर्मा कर मर गये |
"पवन पागल" सच की खोज में,पाँवों में छाले पड़ गये
पहले गिने-चुने दुश्मन थे,अब दुश्मनों के खाते खुल गये |
Mere Dil Se.....
सोमवार, 29 नवंबर 2010
(८०) दूरीयाँ
फासले जैसे भी होंगे,फिर भी मैं उनसे दूर न था
फैसले जो भी होंगे,फिर भी मैं उनमें शामिल न था |
बिछड़े मुसाफ़िर फिर एक होंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
मेरे हिस्से के सभी ग़मों में,मैं नहीं तो ओर कोंन शामिल था?
जो आज लड़ेंगे कल फिर मिलेंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
सच्चाई समझने पर,सभी की जबानों पर ताला था |
इस दोरमें नहीं तो अगले दोर में मिलेंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
तुम आसमान में उड़तें होंगे, मेरा तो हर कदम जमीं पर ही था |
सपने पूरे होंगे,ऐसा मेरा नसीब ही कहाँ था ?
रोज नये कुए खोदता,ओर पुरानों को बूरता था |
"पवन पागल" की खुली किताब को,कोंन समझ पाया था ?
सच लिखते हुये भी,मेरा 'लेखन' अधूरा ही था |
फैसले जो भी होंगे,फिर भी मैं उनमें शामिल न था |
बिछड़े मुसाफ़िर फिर एक होंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
मेरे हिस्से के सभी ग़मों में,मैं नहीं तो ओर कोंन शामिल था?
जो आज लड़ेंगे कल फिर मिलेंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
सच्चाई समझने पर,सभी की जबानों पर ताला था |
इस दोरमें नहीं तो अगले दोर में मिलेंगे,मैं उनसे दूर ही कब था ?
तुम आसमान में उड़तें होंगे, मेरा तो हर कदम जमीं पर ही था |
सपने पूरे होंगे,ऐसा मेरा नसीब ही कहाँ था ?
रोज नये कुए खोदता,ओर पुरानों को बूरता था |
"पवन पागल" की खुली किताब को,कोंन समझ पाया था ?
सच लिखते हुये भी,मेरा 'लेखन' अधूरा ही था |
(७९)पूछेगा कोन
जो गम जिंदगी में न रहे,तो उसे पूछेगा कोन ?
हम उन्हें भूलते जायें,बदलते मोसमों की तरह |
जो हम सदा मयखानों में रहें,तो हमें पूछेगा कोन ?
सरासर इस आग में जल जाओगे,परवानों की तरह |
जो लड़ाई ना लड़ते रहें,तो ज़ख्मों को पूछेगा कोन ?
यूँ ही लड़तें रहें,बहादुर सपूतों की तरह |
जो जिंदगी में बेगानें रहें,तो दीवानों को पूछेगा कोन ?
सुलगते-भुझते रहें,आग ओर पानी की तरह |
सहाय को सभी पूछते रहें,तो असहाय को पूछेगा कोन ?
उनके गम में शामिल होजायें,सागर में नदी की तरह |
जो आपस में मोहबत ही ना रहे,तो उसे पूछेगा कोन ?
"पवन पागल" साथ-साथ रहें,लैला-मजनूं की तरह |
हम उन्हें भूलते जायें,बदलते मोसमों की तरह |
जो हम सदा मयखानों में रहें,तो हमें पूछेगा कोन ?
सरासर इस आग में जल जाओगे,परवानों की तरह |
जो लड़ाई ना लड़ते रहें,तो ज़ख्मों को पूछेगा कोन ?
यूँ ही लड़तें रहें,बहादुर सपूतों की तरह |
जो जिंदगी में बेगानें रहें,तो दीवानों को पूछेगा कोन ?
सुलगते-भुझते रहें,आग ओर पानी की तरह |
सहाय को सभी पूछते रहें,तो असहाय को पूछेगा कोन ?
उनके गम में शामिल होजायें,सागर में नदी की तरह |
जो आपस में मोहबत ही ना रहे,तो उसे पूछेगा कोन ?
"पवन पागल" साथ-साथ रहें,लैला-मजनूं की तरह |
रविवार, 28 नवंबर 2010
(७८)बड़ा जादूगर
तेरी मेहरबानियाँ,हमारी नादानियाँ
दोनों एक साथ रहतें हैं
फिर भी दूरियां बहुत हैं
तू नचाये हम न नाचें ,ऊपर से बजाये शहनाइयाँ|
अगर न होती हमारे में कमियां
तो फिर तो तेरे ही साथ हम रहते
पर तू तो बड़ा ही जादूगर है
ऊपर बैठा नचाता रहता,अपनी कटपुतलियाँ |
जो हम न होते,तो तू क्या करता ?
तुझे भी तो समय,व्यतीत करना ही था
वैसे भी एक राजा को, प्रजा की ज़रूरत होती है
वाह रे वाह बहुत महंगी पड़ी,तेरी ये चतुराईयां |
वैसे तो तू हमें अपना ही अंश बताता है
फिर हममें क्यों इतनी भर दीं बिमारियाँ ?
क्या ख़ता थी जो तडफता छोड़ दिया यहाँ ?
अपने पास ही रखता,जिससे न होंती परेशानियाँ |
बैगर हम खलनायकों के,महानायक है अधूरा
अधूरीं हैं जग की,तमाम कहानियां
बिना खलनायकों के,रचते गीता ,रामायण
सच में तुमने जान-भूझ के,हमसे बनाई हैं दूरियां |
अपनों से ही अपने फ़रियाद कर सकतें हैं
जानतें हैं दूरियां बनाये रखने में तू उस्ताद है
हमें सर झुका कर तेरे,तमाम फैसले मंज़ूर हैं
वंश से अंश को जुदा करने में,तेरी रही होंगी कोई मजबूरियां |
पाप का घड़ा फूटने पर,तू ज़मीं पर आता है
जल्दी भर दे हमारे पापों की,अदछलकत गगरी
जिससे निज़ात मिले इस दुनिया से,ओर जल्दी पहुंचें तेरी नगरी
"पवन पागल"को अब रास नहीं आंतीं,ये खोखली जिंदगानियां |
दोनों एक साथ रहतें हैं
फिर भी दूरियां बहुत हैं
तू नचाये हम न नाचें ,ऊपर से बजाये शहनाइयाँ|
अगर न होती हमारे में कमियां
तो फिर तो तेरे ही साथ हम रहते
पर तू तो बड़ा ही जादूगर है
ऊपर बैठा नचाता रहता,अपनी कटपुतलियाँ |
जो हम न होते,तो तू क्या करता ?
तुझे भी तो समय,व्यतीत करना ही था
वैसे भी एक राजा को, प्रजा की ज़रूरत होती है
वाह रे वाह बहुत महंगी पड़ी,तेरी ये चतुराईयां |
वैसे तो तू हमें अपना ही अंश बताता है
फिर हममें क्यों इतनी भर दीं बिमारियाँ ?
क्या ख़ता थी जो तडफता छोड़ दिया यहाँ ?
अपने पास ही रखता,जिससे न होंती परेशानियाँ |
बैगर हम खलनायकों के,महानायक है अधूरा
अधूरीं हैं जग की,तमाम कहानियां
बिना खलनायकों के,रचते गीता ,रामायण
सच में तुमने जान-भूझ के,हमसे बनाई हैं दूरियां |
अपनों से ही अपने फ़रियाद कर सकतें हैं
जानतें हैं दूरियां बनाये रखने में तू उस्ताद है
हमें सर झुका कर तेरे,तमाम फैसले मंज़ूर हैं
वंश से अंश को जुदा करने में,तेरी रही होंगी कोई मजबूरियां |
पाप का घड़ा फूटने पर,तू ज़मीं पर आता है
जल्दी भर दे हमारे पापों की,अदछलकत गगरी
जिससे निज़ात मिले इस दुनिया से,ओर जल्दी पहुंचें तेरी नगरी
"पवन पागल"को अब रास नहीं आंतीं,ये खोखली जिंदगानियां |
शनिवार, 27 नवंबर 2010
(७७)खून के रिश्ते
खून चाहे हमारे बाप-दादा का हो,या हमारे बेटे-बेटियों का हो
चाहे खून हमारे पोते-पोतियों का हो,या फिर हमारे भाई-बहनों का हो
खून तो खून ही रहेगा,ओर रिश्ता भी खून का ही रहेगा
पर कई बार इन खून के रिश्तों की खातिर
हमें कुछ कुर्बानियां भी देनी पड़ती हैं |
वैसे तो दोनों हाथों से ही ताली बजतीं हैं
पर अकेला चना भी भाड़ नहीं फोड़ सकता है
पर न जानें ऐसा क्या होजाता है ?
की खून के रिश्ते भी बेमानी लगतें हैं
जिन्हें हम अपना समझते हैं,वो पराये लगतें हैं |
कुछ उसूलों की खातिर,या फिर अपने मतलब के लिये
खून के रिश्ते भी टूट जातें हैं
रह्जातीं हैं कुछ यादें,जो ये एहसास दिलातीं रहतीं हैं
की वो पहले वाली सुबह कब आयेगी ?
जिस सुबह में,खून के रिश्तों पर फिर से यकीन होगा
"पवन पागल"जब एक बाप अपने बच्चों से,
पति-पत्नी एक दूसरे से खुश रहें
या फिर समझदारी से समझोता करलें
ओर खून के रिश्तों को,खून के आँसू न बननें दें |
चाहे खून हमारे पोते-पोतियों का हो,या फिर हमारे भाई-बहनों का हो
खून तो खून ही रहेगा,ओर रिश्ता भी खून का ही रहेगा
पर कई बार इन खून के रिश्तों की खातिर
हमें कुछ कुर्बानियां भी देनी पड़ती हैं |
वैसे तो दोनों हाथों से ही ताली बजतीं हैं
पर अकेला चना भी भाड़ नहीं फोड़ सकता है
पर न जानें ऐसा क्या होजाता है ?
की खून के रिश्ते भी बेमानी लगतें हैं
जिन्हें हम अपना समझते हैं,वो पराये लगतें हैं |
कुछ उसूलों की खातिर,या फिर अपने मतलब के लिये
खून के रिश्ते भी टूट जातें हैं
रह्जातीं हैं कुछ यादें,जो ये एहसास दिलातीं रहतीं हैं
की वो पहले वाली सुबह कब आयेगी ?
जिस सुबह में,खून के रिश्तों पर फिर से यकीन होगा
"पवन पागल"जब एक बाप अपने बच्चों से,
पति-पत्नी एक दूसरे से खुश रहें
या फिर समझदारी से समझोता करलें
ओर खून के रिश्तों को,खून के आँसू न बननें दें |
(७६)बेहतर
अनकही दिल में ना रहे,तो बेहतर है
वरना सीनें में गुबार,बनती रहती है
सारी भड़ास एक बार में निकल जाये तो बेहतर है
वरना एक छोटी सी बात,एक लम्बी सी कहानी बन जाती है |
क्यों लोग खोखली ज़िदगी,रह-रह कर जीतें हैं ?
किताबें खुलीं क्यों नहीं रहतीं हैं ?
एक छोटी सी गल्ती भी,इतिहास बन जाती है
इतिहास दोहराया न जाये,तो बेहतर है |
सभी को सभी सवालों का,जवाब देना ज़रूरी नहीं है
चेहरे की ख़ामोशी से समझ जायें,तो बेहतर है
वरना तेवर दिखाने में,क्या देर लगती है ?
कुछ फैसलों में किसी से पूछा ना जाये,तो बेहतर है |
ज़िंदगियाँ सँवारने के लिए,उनका उजाड़ ना क्या बेहतर है
जो आज संवरी ,कल उजड़ सकतीं हैं
आम-राय से फैसले ,होजायें तो बेहतर है
वरना जिंदगी नासूर ,बन जाती है |
झूंट की परतें जल्दी ही खुल जायें ,तो बेहतर है
वरना झूंट पे झूंट,बोलने की आदत बन जाती है
सो झूंट बोलने की बजाय, एक सच बोला जाये तो बेहतर है
वरना "पवन पागल" दिवाली , होली -- बन जाती है |
वरना सीनें में गुबार,बनती रहती है
सारी भड़ास एक बार में निकल जाये तो बेहतर है
वरना एक छोटी सी बात,एक लम्बी सी कहानी बन जाती है |
क्यों लोग खोखली ज़िदगी,रह-रह कर जीतें हैं ?
किताबें खुलीं क्यों नहीं रहतीं हैं ?
एक छोटी सी गल्ती भी,इतिहास बन जाती है
इतिहास दोहराया न जाये,तो बेहतर है |
सभी को सभी सवालों का,जवाब देना ज़रूरी नहीं है
चेहरे की ख़ामोशी से समझ जायें,तो बेहतर है
वरना तेवर दिखाने में,क्या देर लगती है ?
कुछ फैसलों में किसी से पूछा ना जाये,तो बेहतर है |
ज़िंदगियाँ सँवारने के लिए,उनका उजाड़ ना क्या बेहतर है
जो आज संवरी ,कल उजड़ सकतीं हैं
आम-राय से फैसले ,होजायें तो बेहतर है
वरना जिंदगी नासूर ,बन जाती है |
झूंट की परतें जल्दी ही खुल जायें ,तो बेहतर है
वरना झूंट पे झूंट,बोलने की आदत बन जाती है
सो झूंट बोलने की बजाय, एक सच बोला जाये तो बेहतर है
वरना "पवन पागल" दिवाली , होली -- बन जाती है |
(७५)टूटा-तारा
जो उनका नाम,किताबों से निकल कर
गलीयों में आगया
मैं छप कर तो,उनका हो न सका
संग गलीयों में खेल कर
उन्हें अपने करीब पा गया |
जो आसमान से चाँद निकल कर
जमीं पर आगया
लाख कोशिश की मिलने की,पर मिल न सका
फिर चाँद की चांदनी में नहाकर
उसकी शीतलता को बहुत भा गया |
जो सपनों की दुनियां से निकल कर
हकीकत में आगया
न किताबें रहीं--न चाँद रहा--
उनका साथ तो दूर "पवन पागल"
एक टूटा-तारा बनकर रहगया |
गलीयों में आगया
मैं छप कर तो,उनका हो न सका
संग गलीयों में खेल कर
उन्हें अपने करीब पा गया |
जो आसमान से चाँद निकल कर
जमीं पर आगया
लाख कोशिश की मिलने की,पर मिल न सका
फिर चाँद की चांदनी में नहाकर
उसकी शीतलता को बहुत भा गया |
जो सपनों की दुनियां से निकल कर
हकीकत में आगया
न किताबें रहीं--न चाँद रहा--
उनका साथ तो दूर "पवन पागल"
एक टूटा-तारा बनकर रहगया |
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